पर्यावरणीय अर्थशास्त्र एवं सतत विकास
यह संपूर्ण पाठ्यपुस्तक अर्थव्यवस्था एवं पर्यावरण की परस्पर क्रिया, बाह्यताओं (Externalities), कोस के प्रमेय (Coase Theorem), पर्यावरणीय कुजनेट्स वक्र (EKC), पिगोवियन कर, कार्बन व्यापार, पेरिस जलवायु समझौते और भारत के पंचामृत लक्ष्यों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करती है।
बाजार विफलताएं एवं बाह्यताएं
पर्यावरणीय अर्थशास्त्र में बाजार विफलता (Market Failure) तब होती है जब स्वतंत्र बाजार व्यवस्था संसाधनों का कुशल आवंटन करने में विफल रहती है। जब किसी कारखाने के प्रदूषण का प्रभाव तीसरे पक्ष को भुगतना पड़ता है, तो इसे नकारात्मक बाह्यता कहा जाता है।
सामाजिक लागत (Social Cost) समीकरण:
$$\text{सामाजिक लागत (Social Cost)} = \text{निजी लागत (Private Cost)} + \text{बाह्य लागत (External Cost)}$$कोस प्रमेय के अनुसार, यदि संपत्ति के अधिकार (Property Rights) स्पष्ट रूप से परिभाषित हों और सौदा करने की लागत (Transaction Costs) नगण्य हो, तो सरकारी हस्तक्षेप के बिना भी निजी पक्ष बाह्यताओं का कुशल आर्थिक समाधान निकाल सकते हैं।
EKC परिकल्पना के अनुसार, आर्थिक विकास के शुरुआती चरणों में प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन एक निश्चित प्रति व्यक्ति आय (Turning Point) प्राप्त करने के बाद तकनीकी विकास और पर्यावरण जागरूकता के कारण प्रदूषण घटने लगता है (उल्टा U-आकार का वक्र)।
पर्यावरणीय नीतियां: पिगोवियन कर एवं कैप-एंड-ट्रेड
अर्थशास्त्री आर्थर पिगू के अनुसार, प्रदूषण उत्पन्न करने वाली इकाइयों पर उनकी बाह्य क्षति के बराबर कर लगाया जाना चाहिए ('प्रदूषक भुगतान करे' सिद्धांत)। 'कैप-एंड-ट्रेड' (Cap-and-Trade) व्यवस्था में सरकार प्रदूषण की सीमा निर्धारित करती है और कार्बन क्रेडिट का व्यापार करने की अनुमति देती है।
वैश्विक समझौते एवं भारत का 'पंचामृत' लक्ष्य
भारत ने ग्लासगो COP26 सम्मेलन (2021) में 5 पंचामृत संकल्प पेश किए: 1. 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 GW तक बढ़ाना, 2. 50% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करना, 3. 2030 तक कुल कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कटौती, 4. अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45% से कम करना, और 5. वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य (Net Zero) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य।
भारत में पर्यावरण आंदोलन एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)
सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चिपको आंदोलन (1973) तथा मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भारत में पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाया। वर्ष 2010 में त्वरित पर्यावरणीय न्याय हेतु राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) की स्थापना की गई।