समाजशास्त्रीय सिद्धांत एवं भारतीय समाज
यह संपूर्ण पाठ्यपुस्तक समाजशास्त्र के जनक अगस्ट कॉम्ट (प्रत्यक्षवाद), इमैनुएल दुर्खीम (सामाजिक तथ्य एवं आत्महत्या), कार्ल मार्क्स (ऐतिहासिक भौतिकवाद एवं वर्ग संघर्ष), मैक्स वेबर (नौकरशाही) तथा एम.एन. श्रीनिवास (संस्कृतिकरण एवं पश्चिमीकरण) के सिद्धांतों का विस्तृत विवरण प्रदान करती है।
शास्त्रीय समाजशास्त्रीय विचारक
समाजशास्त्र के जनक अगस्ट कॉम्ट के अनुसार, मानव चिंतन एवं ज्ञान का विकास तीन ऐतिहासिक अवस्थाओं से गुजरता है:
ज्ञान विकास के 3 स्तर:
- 1. धार्मिक स्तर (Theological Stage): सभी घटनाओं को अलौकिक शक्तियों और ईश्वर की इच्छा का परिणाम माना जाता है।
- 2. तात्विक स्तर (Metaphysical Stage): अमूर्त शक्तियों और दार्शनिक सिद्धांतों द्वारा व्याख्या की जाती है।
- 3. प्रत्यक्षवादी / वैज्ञानिक स्तर (Positive/Scientific Stage): वैज्ञानिक अवलोकन, प्रयोग और तर्क पर आधारित नियम।
दुर्खीम के अनुसार, समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र 'सामाजिक तथ्य' हैं जो व्यक्ति के बाहर स्थित (Exteriority) होते हैं और उस पर दबाव (Coercion) डालते हैं। दुर्खीम ने आत्महत्या के 4 प्रकार बताए: 1. अहम्वादी (Egoistic), 2. परार्थवादी (Altruistic), 3. अनियंत्रित/विसंगतिजन्य (Anomic), 4. भाग्यवादी (Fatalistic)।
कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848)
"अब तक के विद्यमान सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।" मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज में दो मुख्य वर्ग होते हैं: बुर्जुआ (Bourgeoisie - साधन स्वामी) तथा सर्वहारा (Proletariat - श्रमिक वर्ग)।
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को 'सामाजिक क्रिया' (Social Action) की व्याख्यात्मक समझ का विज्ञान माना। उन्होंने नौकरशाही का आदर्श प्रारूप (Ideal Type) प्रस्तुत किया जिसकी विशेषताओं में नियमों की लिखित व्यवस्था, पदसोपान (Hierarchy) और अवैयक्तिकता शामिल है।
भारतीय समाजशास्त्र एवं गतिशीलता
संस्कृतिकरण (Sanskritization): वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक निम्न जाति किसी उच्च द्विज जाति की जीवनशैली, अनुष्ठानों एवं रीति-रिवाजों का अनुकरण करके अपनी सामाजिक स्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयास करती है।
जी.एस. घुर्ये ने भारत में जाति व्यवस्था की 6 मुख्य विशेषताएं बताईं: 1. समाज का खंडात्मक विभाजन, 2. सोपानात्मक व्यवस्था (Hierarchy), 3. भोजन एवं सामाजिक सहभोज पर प्रतिबंध, 4. नागरिक एवं धार्मिक असमर्थताएं, 5. पेशों के चयन में अप्रतिबंधित चुनाव का अभाव, 6. अंतर्विवाह (Endogamy) का नियम।