राज्य के नीति निर्देशक तत्व
भाग IV में शामिल महत्वपूर्ण नीति निर्देशक तत्व:
- अनुच्छेद 38: राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।
- अनुच्छेद 39: राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व (जैसे जीविका के पर्याप्त साधन, समान कार्य के लिए समान वेतन)।
- अनुच्छेद 39A: समान न्याय और गरीबों व आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को मुफ्त कानूनी सहायता।
- अनुच्छेद 40: स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में ग्राम पंचायतों का संगठन।
- अनुच्छेद 41: कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।
- अनुच्छेद 43: कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और कुटीर उद्योगों का संवर्धन।
- अनुच्छेद 43A: उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना।
- अनुच्छेद 44: भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC)।
- अनुच्छेद 45: छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा का उपबंध।
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन तथा वनों और वन्य जीवों की रक्षा।
- अनुच्छेद 50: राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।
- अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि।
राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP) सरकार के लिए कानून और नीतियां बनाते समय एक संवैधानिक रोडमैप और दिशा-निर्देश के रूप में कार्य करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को प्राप्त करना है, जिससे भारत एक कल्याणकारी राज्य में परिवर्तित हो सके।
यद्यपि संविधान में नीति निर्देशक तत्वों का स्पष्ट वर्गीकरण नहीं किया गया है, फिर भी उनकी वैचारिक उत्पत्ति के आधार पर इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
- समाजवादी सिद्धांत: सामाजिक और आर्थिक समानता प्राप्त करने, धन के संकेंद्रण को रोकने और कल्याणकारी गारंटियां प्रदान करने के उद्देश्य से (अनुच्छेद 38, 39, 39A, 41, 42, 43, 43A, 47)।
- गांधीवादी सिद्धांत: महात्मा गांधी के ग्रामीण विकास और नैतिक प्रगति के दृष्टिकोण पर आधारित, जैसे ग्राम पंचायतें, कुटीर उद्योग और नशीले पदार्थों पर रोक (अनुच्छेद 40, 43, 43B, 46, 47, 48)।
- उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांत: समान नागरिक संहिता, मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और अंतर्राष्ट्रीय शांति जैसी उदारवादी विचारधाराओं से प्रेरित (अनुच्छेद 44, 45, 48, 48A, 49, 50, 51)।
अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति निर्देशक तत्व गैर-न्यायसंगत (गैर-वादयोग्य) हैं—यानी इन्हें किसी भी अदालत द्वारा सीधे लागू नहीं कराया जा सकता। हालांकि, यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहता है कि ये सिद्धांत "देश के शासन में मूलभूत हैं" और कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है।